अजब हमने देखे जहाँ में नजारे
प्यासे खड़े थे नदी के किनारे
रविवार, 5 अप्रैल 2009
गज़ले
जो आंसू फैल कर दरिया हुआ है हमारी आंख से टपका हुआ है । नही था बर्क मेरा नाम जिस पर वो दाना दांत मैं अटका हुआ है । ...............................................................
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